• Kanika Chauhan

करेले की प्रमुख जातियों के चारित्रिक गुण


पूसा 2 मौसमी :- इस किस्म का विकास भारतीय अनुसन्धान संस्थान नई दिल्ली द्वारा किया गया है यह शीघ्र तैयार होने वाली किस्म है इसके फल मध्यम लम्बे, हरे रंग के और कोमल होते है इस किस्म के फलों में लम्बाई में एक किनारे से दुसरे किनारे तक धारियां रहती है इस किस्म को वर्षा कालीन और ग्रीष्म कालीन फसल के रूप में उगाया जाता है बुवाई के 60-65 दिनों में फल पहली तुड़ाई के लिए तैयार हो जाते है यह प्रति हे. 100 क्विंटल तक उपज दे देती है फल का औसत भार 90 ग्राम होता है।


कोयम्बूर लौंग :- इस किस्म के पोधे अधिक फैलते है और फल भी अधिक संख्या में लगते है इसके फल लम्बे और सफ़ेद रंग के होते है यह खरीफ के मौसम में उगाने के लिए उपयुक्त किस्म है यह 80-100 क्विंटल तक प्रति हे. उपज देती है। इसके फल का भार 70 ग्राम होता है।


अर्का हरित :- इस किस्म का विकास भारतीय बागवानी अनुसन्धान संस्थान बंगलौर द्वारा किया गया है यह कम फैलने वाली किस्म है इसके फल मध्यम आकार के व हरे रंग के होते है इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह की इसके फलों में बीज कम होते है। यह किस्म गर्मी और वर्षा दोनों मौसम में उगाई जा सकती है यह प्रति हे. 90-120 क्विंटल तक उपज देती है इसकी प्रत्येक बेल पर 30-40 फल लगते है। इस किस्म में अन्य किस्मों की तुलना में कम कडवाहट होती है। इसके फल का भार 80 ग्राम होता है।


कल्याण पुर बारह मासी :- इस किस्म का विकास चन्द्र शेखर आजाद कृषि प्रौद्योगिक वि. वि. के शाक-भाजी अनुसन्धान केंद्र कल्याणपुर द्वारा किया गया है। इस किस्म के फल हरे और देखने में अत्यंत आकर्षक लगते है इसे गर्मी और वर्षा के मौसमों में उगाया जा सकता है यह किस्म पुरे वर्ष फल देती रहती है यही कारण है की इसे बारह मासी कहा जाता है।


हिसार सेलेक्शन :- इस किस्म का विकास चौधरी चरण सिंह कृषि वि. वि. हिसार द्वारा किया गया है। इस किस्म के फल हरे रंग के और मध्यम आकार के होते है। यह किस्म हरियाणा में दिनों -दिन लोकप्रिय होती जा रही है।

सी 16 :- इस किस्म का विकास पंजाब कृषि वि. वि. लुधियाना द्वारा किया गया है यह एक उन्नत किस्म है जिसके फल हरे रंग के होते है यह पूसा दो मौसमी नामक किस्म से अधिक पैदावार देती है यह प्रति हे. 128.9 क्विंटल तक उपज देती है।


प्रिया :- इस किस्म का विकास केरल कृषि वि. वि. त्रिचुर द्वारा किया गया है जिसे बी. के. 1 का नाम भी दिया गया है इस किस्म के फल 19 से.मि. लम्बे होते है बीज बोने के 60 दिनों बाद फल पहली तुड़ाई के लिए तैयार हो जाते है प्रति बेल से 35 फल मिल जाते है। इसकी बेलों को 14 गुणा 2 मीटर की दुरी पर रखना आवश्यक होता है। द. भारत में इस किस्म को साल में 3 बार उगाया जा सकता है। मई से सितम्बर, सितम्बर से जनवरी, और फ़रवरी से मई। उत्तर भारत में इसे अगस्त - सितम्बर में उगाया जाता है इसकी प्रति हे. 80 टन तक उपज मिल जाती है।


एम.डी.यू. 1 :- करेले की यह नवीनतम किस्म है इस किस्म के फल हरे रंग के होते है जो देखने में अत्यंत आकर्षक होते है यह किस्म उपज देने वाली किस्म है।


पूसा विशेष :- इस किस्म का विकास भारतीय अनुसन्धान संस्थान नई दिल्ली द्वारा किया गया है। यह किस्म बोने के 55 दिन बाद फल देने लगता है अत: यह काफी अगेती किस्म है। इस किस्म के फल मध्यम, मोटे व हरे रंग के होते है इनका गुदा मोटा होता है जो सब्जी बनाने, सुखाकर उपयोग करने और आचार बनाने के लिए उपयुक्त है। इसके फल गहरे चमकीले हरे रंग के होते हैं। फल का भार लगभग 155 ग्राम होता है। यह प्रति हे. 150 क्विंटल तक उपज दे देती है। पूसा 2 मौसमी के मुकाबले 25% अधिक़ उपज देती है। इस किस्म को उत्तर भारत के मैदानी भागों में फ़रवरी - जून तक उगाने की सिफारिश की गई है इसके पौधे की औसत लम्बाई 1.20 मीटर होती है।


फैजाबादी बारह मासी :- इस किस्म के फल लम्बे पतले व कोमल होते है इसकी लताएँ अधिक फैलने लगती है और पुरे साल फल लगते रहते है।


आर.एच.बी.बी.जी. 4 :- यह किस्म उत्तरी मैदानों और मध्य क्षेत्रों में उगाने के लिए उपयुक्त किस्म है।

के.बी.जी. 16 :- यह उत्तरी मैदानों में उगाने के लिए उपयुक्त किस्म है।


पूसा संकर 1 :- इस किस्म का विकास भारतीय कृषि अनुसन्धान संस्थान नई दिल्ली द्वारा किया गया है। इसकी फसल 50-55 दिन में तैयार हो जाती है यह करेला की पिछली किस्मों जैसे पूसा विशेष और पूसा दो मौसमी की तुलना में 42 और 58 % अधिक उपज देने में सक्षम है। इसकी औसत उपज 21.8 टन प्रति हे. पाई गई है। देश के उत्तरी मैदानी भागों में व्यावसायिक खेती हेतु यह एक उपयुक्त किस्म है।

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