• Kanika Chauhan

सपने..!!

हर रात सोने से पहले सिरहाने रखती हूं कुछ जीवित सांस लेते हुए सपने, जिन्हें सुबह होते ही पाती हूं दम तोड़ते!! हर कोई मुझे पिंजरा दिखाता हुआ सा नजर आता है, जबकि मैं सुबह, दोपहर, शाम पंछियों की तरह चह-चहाना चाहती हूं!! धरती के इस छोर से उस छोर तक फूल उगाना चाहती हूं… दिलों को बांटती घर-घर के बीच खड़ी दीवारों पर नफरत मिटाकर, उन पर मुस्कुराते हुए चहरों के चित्र बनाना चाहती हूं!! मेरे आस-पास जितनी भीड़ बढ़ती जाती है, उतनी ही तनहाई भी बढ़ती जाती है!! मन के पुस्तकालय से एक भी किताब पढ़ नहीं पाती, अपना साथ ही किसी के होने का एहसास दिला पाता है!! बहुत याद आती है अपनी मैं और मैं, हम अगर साथ होते, तो बहुत गहराई में उतरकर ले आते कुछ सुंदर, संख-सीप और मोती

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