• Kanika Chauhan

सांवली सी याद

सांवली सी याद लेकर मैं यूं ही चल पड़ी। नंगे पैर खाली हाथ लेकर ही मैं बड़ी चली। घनघोर थी रात और चांदनी सा सितम। चलना सिर्फ चलना ही सा था मेरा धर्म। मंजिल में दिखा मुझे कल का सच। मैंने ऐसी दुनिया कभी देखी ना थी । जहां मेरे चलने या उड़ने पर रोक ना थी। पर ना काटे जाते थे मेरे जहां। जिंदगी में प्यार ही प्यार था जहां। सपना टूटा जब मेरा तो हकीकत नजर आई। लगा जैसे कि कोई दूर जन्नत से लौट कर में आई। रो पड़ी में अपनी यह हालत देख कर। जहां मारा जाता हूं मुझे सिर्फ लड़की देख कर। मौका तो दो मुझे। उड के मैं दिखाऊंगी। सांवली सी याद लेकर फिर कहीं चली जाऊंगी।

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