• Kanika Chauhan

सोच की बेड़ियों में बंधा हिंदुस्तान

बचपन से हम सभी पढ़ते सुनते आ रहे हैं… “मज़हब नहीं सिखाता, आपस में बैर रखना हिंदी है हम, वतन है हिंदुस्तान हमारा” पर शायद हिंदुस्तान के साथ-साथ इस पंक्ति के  मायने भी बदल गए, अगर कुछ नहीं बदला तो वो है भेदभाव। आज़ाद सोच का आज़ाद हिंदुस्तान आज भी मज़हब, जाति, रंग-रूप, अमीर-गरीब इन सभी ज़ंजीरों में कैद है। आज भी हिंदुस्तान में व्यक्ति की पहचान उसके हुनर से नहीं बल्कि उसके Social Status से होती है… उसके रंग-रूप से होती है.. उसके मज़हब से होती है।

न जाने हमारा देश कब इतना बदल गया… कल तक केसरिया और हरा रंग, रंग ही थे, पर आज धर्मों के प्रतिक बन गए। आज अगर किसी से पूछ लिया जाए कि तुम क्या हो या कौन हो? तो लोग जवाब देते हैं मैं हिन्दू हूं.. पंजाबी हूं.. पर कभी किसी को ये बोलते नहीं सुना कि वो हिंदूस्तानी है या इंडियन है या भारतीय है।

भारतीय संस्कृति और विचारों का दम भरने वाले ऐसे लोग अपने भाषणों में, रैलियों में, तक्रीर में बदलाव की बातें तो करते हैं पर जिस बदलाव के लिेए हम आए दिन Protest कर रहे हैं, दंगे कर रहे हैं, सरकार पर ताने कस रहे हैं वो बदलाव असल में और कोई नहीं सिर्फ हम ही ला सकते हैं। जरूरत है तो बस इन ज़जीरों को तोड़ कर इस छोटी सोच की कैद से बाहर आने की। इंसानियत को अपना धर्म और हुनर को अपनी पहचान बनाने की। UNITY IN DIVERSITY को TAG LINE नहीं एक नई सोच बनाने की। शायद तभी हम कह सकेगें कि हिंदी है हम वतन है हिंदुस्तान हमारा।

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