• Kanika Chauhan

सफलता के पीछे छुपी मेहनत

सुबह का सूरज निकला ही था… सफाई भी हो रही थी… और लोगों का लगातार आना-जाना लगा हुआ था। कोई आ रहा था तो कोई जो रहा था… कोई शायद जल्दी में भी था… वो बस ये सोच रही थीं कि कब ये सब खत्म होगा और उसको शायद थोड़ी देर के लिए आराम मिल जाए… कोई कुछ गिरा कर उसे गंदा कर देता तो कोई कुछ… वैसे तो सुबह सफाई हो चुकी थी पर फिर से सफाई की जरूरत थी।

मंदिर की सीढ़ियां सोच रही थी कि सब मेरे ऊपर से होकर मंदिर जाते हैं और वहां रखी मूर्ति की ही पूजा करते हैं…

जब सूरज सर पर आ गया था और अब लोगों का आना-जाना भी कम हो गया तो मंदिर की सीढ़ियां मूर्ति से बोली बात करने लगी…

सीढ़ी बोली… मूर्ति मुझे तुमसे बहुत ईर्ष्या होता है..

क्यों… बड़े ही आश्चर्य से मूर्ति से पूछा..

तो सीढ़ी बोली रोज लोग मंदिर आते हैं…

मूर्ति बीज में सीढ़ी की बात काटते हुए बोली, तो इसमें ईर्ष्या….

सीढ़ी बोली देखो लाखों लोग रोज मंदिर आते हैं और मेरे ऊपर से चढ़ कर तुम्हारे पास आकर तुम्हारी पूजा करते हैं, लेकिन मुझे कभी कोई नहीं पूजता…

मूर्ति बोली तुम्हारी बात तो सही है पर तुमने क्या कभी ये सोचा है कि मुझे पत्थर से मूर्ति बनने के लिए कितने हथौडे मारे गए। न जाने कितनी ही चोट से मैंने ये रूप पाया।सीढ़ी मूर्ति की बात सुन सोच में पड़ गई…

तभी मूर्ति बोली तुम तो जैसे आई वैसे ही रूप में रही लेकिन मेरा….

अक्सर लोग सिर्फ ये तो देख लेते हैं कि आप कितने ऊंचाई पर हो पर ये कभी नहीं देखते कि उस ऊंचाई को पाने के लिए कितनी मेहनत लगी है। मूर्ति की सारी बातें ध्यान से सुनने के बाद सीढ़ियों को समझ आ गया था कि वो कितना गल़त सोच रही थी। अब उन्हें मूर्ति के लिए ईर्ष्या नहीं बल्कि सम्मान था।

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