• Kanika Chauhan

सजना है मुझे सजना के लिए

‘मैं को सवाँरने में, मैं मशगूल क्या हुई,

तुम ने हम का नया मतलब ढूँढ लिया।

तुम न समझे लेकिन, एक तुम्हारे मैं के इंतजार में,

मैंने अपने कितने, मैं कुर्बान हैं किए।’

अपनी मुस्कान के पीछे अपने गुस्से को छुपाते हुए निखत ने बड़े ही शायराना अंदाज में आदित्य को जवाब दिया था। निखत के पति आदित्य की बहुत अच्छी नौकरी थी दोनों देश की राजधानी दिल्ली में खुशी से रहते थे। जब उन के घर उनकी बेटी ने जन्म लिया तो निखत ने अपनी इच्छा से नौकरी छोड़ने का निणय किया था। बेटी के साथ समय और जीवन दोनों ही कैसे बीत जाता, पता ही नहीं चलता था। कभी-कभी तो आईना देखे हुए, तीन-चार दिन हो जाते थे। निखत अभूतपूर्व सुंदरी तो नहीं थी, लेकिन उसके नैन-नक्क्ष बहुत ही आकर्षक थे।

उसके साँवले चेहरे पर सजी नुकीली नाक और काली गहरी आँखें, उसके चेहरे की लुनाई को बढ़ा देते थे। हल्का सा पाउडर, थोड़ी सी क्रीम और एक न्यूड लिपस्टिक, यह था उसका मेकअप रुटीन। शादी के पहले पापा को और शादी के बाद आदित्य को अधिक मेकअप पसंद नहीं था। लाल लिपस्टिक तो उसने अब तक के अपने जीवन में मात्र एक बार अपने विवाह के अवसर पर लगाई थी।

शुरूआत में निखत ने थोड़ा विरोध किया था, लेकिन आदित्य ने बड़े प्रेम से कहा था, “तुम तो बिना मेकअप कितनी सुंदर लगती हो। मेकअप के पीछे छिपने वालों में आत्मविश्वास की कमी होती है।” फिर उसने भी एक मुस्कान के साथ आदित्य की यह बात स्वीकार कर ली थी। शांत जल में हलचल के लिए केवल एक पत्थर ही काफी होता है। उस शाम निखत बिग बाजार में शॉपिंग कर रही थी। घर जाने की जल्दबाजी भी नहीं थी। नन्ही परी घर पर नानी के साथ थी, तो बच्ची की चिन्ता नहीं थी।

डाइपर की खरीदारी करके बिलिंग की तरफ जा ही रही थी कि वह एक आवाज़ पर ठहर गई थी।

“मैडम! एक नया लिक्विड काजल आया है, ट्राई कर लिजिए।”

न जाने कौन सी भावना से प्रेरित होकर निखत उस काउंटर की तरफ मुड़ गई थी। पहले काजल और फिर लाईनर, निखत ने शीशे में अपने आप को देखा तो देखती रह गई। उसकी आँखे तो वही थीं, किंतु उन आँखों को उभार मिल गया था। उसे लाईनर लगाना नहीं आता था, फिर भी लाईनर और काजल दोनों ही लेकर वह घर आ गई थी।

अगले दिन जब उसकी बेटी परी के सो जाने के बाद नहाकर तैयार हो ही रही थी, कि नजर सामने रखे लाईनर पर चली गई। कुछ सोचकर उसने यूट्यूब खोला और लाईनर लगाने का वीडियो ढूँढ़ने लगी। कुछ ही मिनट में उसे वीडियो मिल गया। कुछ घण्टे के परिश्रम के बाद भी, निखत अच्छी तरह से लगाना सीख नहीं पाई। लेकिन उसने लगाना छोड़ा नहीं। प्रतिदिन स्नान के पहले वह एक बार जरूर लगाती। एक महीने का समय और वह लाईनर लगाने में एख दम परफेक्ट हो गई थी। वह जानती थी कि औरों के नजर में यह कोई बड़ी उपलब्धि नहीं थी, किंतु उसके लिए तो यह उपलब्धि ही थी।

लाईनर लगाने से न तो उसकी आँखे कृत्रिम रुप से बदल गई थी, न ही उसका व्यक्तित्व बदला। हाँ, लेकिन उसकी आँखो को एक भिन्न तथा सुंदर आकार मिल गया था। सकारात्मक परिवर्तन तो अच्छा है। उस दिन के बाद निखत मेकअप से जुड़े हुए वीडियो देखने लगी थी। उसे आभास हुआ कि ऐसे वीडियो उसे रूचिकर लगते हैं। आज से पहले मैकेनिकल इंजीनियरिंग के अतिरिक्त जासूसी पुस्तकों में उसकी दिलचस्पी थी। अब उसे मालूम हुआ था कि मेकअप करना भी उसे पसंद था।

इंस्टाग्राम पर अकाउंट बना कर वह उन सभी को फॉलो करने लगी जो मेकअप से संबंधित जानकारी देते अथवा देती थीं। पुरुषों द्वारा मेकअप लगाने के तरीकों वाला वीडियो देखना, उसके लिए एक सुखद आश्चर्य था। मेकअप करना भी एक आर्ट है। जैसे चित्रकार चित्र में रंग भरता है, वैसे ही मेकअप करने वाला शरीर के हिस्सों को रुप रेखा प्रदान करता है। वास्तव में हर चेहरा सुंदर होता है। मेकअप मात्र चेहरे की उस सुंदरता को रेखांकित अथवा अंडरलाइन कर देता है।

हाँ, लेकिन चयन का अधिकार अपना होना चाहिए। इस आर्ट को सीखने व इस्तेमाल करने की स्वतंत्रता पुरूष अथवा स्त्री को मिलनी चाहिए। जो इस आर्ट को सीखकर इस्तेमाल करते हैं, जो इस आर्ट को बिना सीखे इस्तेमाल करते हैं अथवा जो इस आर्ट का इस्तेमाल ही नहीं करना चाहते। किसी के लिए भी राय बनाकर आलोचना करना गलत है। कोई अधिक मेकअप करता है, कोई कम करता है, कोई ठीक से नहीं कर पाता है फिर भी करता है अथवा कोई नहीं करना चाहता है। यह उस व्यक्ति विशेष का व्यक्तिगत निर्णय है, उस पर ही छोड़ देना चाहिए।

इन सभी विचारों के बादल उसके मन रूपी आकाश पर घुमड़ते रहते थे। निखत अपने विचारों के साथ परिपक्व हो रही थी और समय अपने रूप से आगे बढ़ रहा था। देखते ही देखते परी दो साल की हो गई थी। परी के जन्मदिन के अवसर पर एक बड़ी पार्टी का आयोजन किया गया था। परी को तैयार कर निखत स्वयं तैयार होने लगी थी।

ऑफ वाईट साड़ी पर छोटे-छोटे सुनहरे तारें बिखरे हुए थे। सुनहरी हाल्टर नेक ब्लाउज, साड़ी की सुंदरता में चार चाँद लगा रहे थे। चेहरे पर मेकअप समाप्त कर, लिपस्टिक का डेंजरस शेड लगाकर पलटी ही थी कि सामने आदित्य खड़े थे। निखत पर नजर पड़ते ही उनके चेहरे का रंग उड़ गया था।

“यह क्या है? अपने चेहरे पर इतनी पुताई क्यों कर रखी है? अभी अपना चेहरा धो कर आओ।” उनके आवाज़ में तल्खी थी।

“क्यों?” निखत शांत थी।

“क्योंकि हम दिखावा नहीं करते।”

इस पर ही निखत ने शायराना अंदाज के पीछे अपने क्रोध को छिपाते हुए उत्तर दिया था।

“शायरा भी हो गई हो।”

“बस यूँ ही।”

“तुम इतना मेकअप क्यों करती हो? तुम्हें आवश्यकता क्या है? मुझे तो तुम बिना मेकअप अच्छी लगती हो।”

“तुमसे किसने कहा मैं मेकअप तुम्हारे लिए करती हूँ?”

“फिर क्या दूसरे मर्दों के लिए करती हो?” इस बार आदित्य की आवाज में क्रोध के साथ अपमान मिश्रित था।

किंतु आश्चर्य निखत उस अपमान के बावजूद खिलखिला कर हँस पड़ी थी। उसकी हँसी के पीछे का कारण आदित्य भी समझ नहीं पा रहा था।

थोड़ी देर में खुद को संभाल कर बोली थी

“तुम पुरुष स्वयं को इतना महत्व क्यों देते हो?

“क्या मतलब?” आदित्य अभी भी कुछ भी समझ नहीं पा रहा था।

“हम स्त्रियाँ तुम पुरुषों के लिए तैयार नहीं होतीं। हम स्वयं के लिए सजती हैं, मेकअप करती हैं। स्वयं के साथ प्रेम का वह अप्रतिम क्षण होता है।”

फिर थोड़ा रुककर एक मुस्कान के साथ बोली

“वैसे भी प्रशंसा अथवा ईष्या दग्ध प्रशंसा कोई देती है, तो वह दूसरी स्त्री ही है। वह ही लाल रंग के लिपस्टिक के सैकड़ों शेड के मध्य, अपना वाला रेड देख लेती है। किसी दूसरे पर अच्छा लगने पर प्रशंसा करती है। यदि अगले दिन खोजने निकलती है, तो ढूँढ कर ही दम लेती है।

तो प्रिय पुरुषों या तो हम स्वयं के लिए तैयार होते हैं अथवा कभी-कभी अपनी स्त्री प्रजाति के लिए। तुम्हारे लिए तो कदापि नहीं। यह खुशफहमी छोड़कर हमें हमारी इच्छा से जीने दो।”

आदित्य को उत्तर मिल गया था। वह समझदार था और समझदार को एक इशारा ही बहुत है। एक मुस्कान के साथ उसने अपनी गलती स्वीकार कर ली थी। दोनों पार्टी के लिए साथ ही निकल पड़े थे। निखत के होंठ गुनगुना रहे थे,

सजना है मुझे अपने लिए, सजना है मुझे अपने लिए

आज जरा नया शेड लगा लूँ, हाइलाइटर ब्राउन सजा लूँ

आई को स्मोकी लुक दे दूँ, मैं तो सज गई रे….मैं तो….

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