• Kanika Chauhan

लोगों को आकर्षित करता है पंजाब



पंजाब अपने खान-पान तो लेके पहनावे ते सभ्यचार नु लेके दुनिया भर बीच मशहूर है। पंजाब दा मन नु मोह लेन वाला सभेयाचार, ओथों दे चटपटे व्यंजन भावपूर्ण संगीत ने हमेशा लोका नु आकर्षित किता है। भंगड़ा, गिद्धा पंजाब दी संस्कृति दा वड्डा हिस्सा हुंदा है। भंगड़ा पंजाब दा मशहूर लोक नाच है। पंजाबी अपने लोक नाच वाखो पूरी दुनिया विच जाने जांदे हैं। जे तुसी पंजाब या पंजाबी संस्कृति या ओना दे लेई दीवाने हो तन अज दा विशेष तुहाडे वास्ते है………..

सांस्कृतिक जीवन

लोकगीत, प्रेम और युद्ध के नृत्य मेले और त्योहार, नृत्य, संगीत तथा साहित्य इस राज्य के सांस्कृतिक जीवन की विशेषताएं हैं। पंजाबी साहित्य की उत्पत्ति को 13 वीं शताब्दी के मुसलमान सूफी संत शेख़ फरीद के रहस्यवादी और धार्मिक दोहों तथा सिक्ख पंथ के संस्थापक, 15वीं-16वीं शताब्दी के गुरु नानक से जोड़ा जा सकता है। जिन्होंने पहली बार काव्य अभिव्यक्ति के माध्यम के रूप में व्यापक रुप से पंजाबी भाषा का उपयोग किया। 18वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में पंजाबी साहित्य को समृद्ध बनाने में वारिस शाह की भूमिका अतुलनीय है। 20वीं शताब्दी के आरंभ में कवि व लेखन भाई वीरसिंह तथा कवि पूरण सिंह और धनी राम चैत्रिक के लेखन के साथ ही पंजाबी साहित्य ने आधुनिक काल में प्रवेश किया। पंजाबी संस्कृति के विभिन्न पहलुओं को चित्रित करने वाली विभिन्न लेखकों, कवियों और उपन्यासकारों की भूमिका भी काफ़ी महत्त्वपूर्ण है। कवियों में सबसे प्रसिद्ध मोहन सिंह माहिर और शिव कुमार बटालवी थे उपन्यासकारों में जसंवतसिंह कंवल, गुरदयाल सिंह और सोहन सिंह शीतल उल्लेखनीय हैं कुलवंत सिंह विर्क एक विख्यात लेखक हैं। पंजाब के ग्रामीण जीवन का चित्रण करने वाले सर्वश्रेष्ठ उपन्यासों में से एक ज्ञानी गुरदित सिंह की मेरा पिण्ड है, जो पंजाबी साहित्य की उत्कृष्ट रचना है।








राज्य के उल्लेखनीय वास्तुशिल्प स्मारकों में अमृतसर में स्थित स्वर्ण मंदिर (हरमंदिर) है, जो उत्तर मुग़ल शैली के अनुरूप निर्मित है। इसके गुंबद और ज्यामितीय रुपांकन जैसी प्रमुखताएं सिक्खों के अधिकांश पूजा स्थलों में दुहराई गई हैं। स्वर्ण मंदिर में सोने की जरदोजी का काम, बूटेदार फलक और रंगीन पत्थरों से सज्जित संगमरमर की दीवारें हैं। अन्य महत्त्पूर्ण भवनों में अमृतसर में जलियाँवाला बाग़ में शहीद स्मारक, दुर्गियाना (अमृतसर में भी) का हिन्दू मंदिर, कपूरथला में स्थित मूर शैली की मस्जिद और भटिंडा तथा बहादुरगढ़ में स्थित पुराने क़िले हैं।

पंजाब के उद्योग

कृषि पंजाब का सब से बड़ा उद्योग है; यह भारत का सब से बड़ा गेहूँ उत्पादक है और प्रमुख उद्योग हैं: वैज्ञानिक साज़ों, कृषि, खेल और बिजली सम्बन्धित माल, सिलाई मशीनें, मशीन यंत्रों, स्टार्च, साइकिलों, खादें आदि का निर्माण, वित्तीय रोज़गार, सैर-सपाटा और देवदार के तेल और खंड का उत्पादन। पंजाब में भारत में से सब से अधिक इस्पात के लुढ़का हुआ मीलों के कारख़ाने हैं जो कि फ़तहगढ़ साहब सुसत की इस्पात नगरी मंडी गोबिन्दगढ़ में हैं।

पंजाब के लोग

पंजाब पर्यटन, पंजाबी संस्कृति और परंपरा को नजदीक से देखने का अवसर प्रदान करता है। यहां रहने वाले ज्‍यादातर लोग सिक्‍ख है। यहां के अमृतसर में स्‍वर्ण मंदिर स्थित है जो सिक्‍खों का प्रमुख धार्मिक स्‍थल है। पंजाब के हर गांव में गुरूद्वारा होता है। यहां का दूसरा सबसे प्रमुख धर्म हिंदू है। पंजाबी यहां की आधिकारिक भाषा है।

यहां के लोग बहुत खुश रहते है, वह मस्‍त रहने में विश्‍वास रखते है और विभिन्‍न सांस्‍कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेकर जीवन का आनंद उठाते है। कई प्रकार के भोजन के साथ नाच गाने का शौक पंजाबियों को अलग बना देता है। पंजाब के मुख्‍य त्‍यौहार, लोहड़ी, बंसत, वैसाखी, और तीज है।

पंजाबी संगीत

भांगड़ा तेजी से पश्चिम में बात सुनी जा रही है कि कई पंजाबी संगीत कला रूपों में से एक है और इस तरह के निर्माण करने के लिए अन्य रचनाओं के साथ मिश्रण के रूप में कई मायनों में पश्चिमी संगीतकारों द्वारा इस्तेमाल किया जा रहा है पंजाबी संगीत की जरूरत है एक मुख्यधारा पसंदीदा बनता जा रहा है इसके अलावा जरूरत पुरस्कार विजेता पंजाबी शास्त्रीय संगीत तेजी से पश्चिम में लोकप्रिय होता जा रहा है।

पंजाबी नृत्य


पंजाबी संस्कृति की और पंजाबी समुदाय के लंबे इतिहास के कारण सामान्य रूप से फसल, त्योहारों, और शादियों सहित उत्सव के समय में प्रदर्शन किया नृत्य की एक बड़ी संख्या वहां है। नृत्य की विशेष पृष्ठभूमि गैर धार्मिक और धार्मिक हो सकता है। समग्र शैली उच्च ऊर्जा “भांगड़ा” और अधिक सुरक्षित करने के लिए पुरुषों के नृत्य महिलाओं के नृत्य से लेकर कर सकते हैं। पंजाब का एक और पहलू है जहां का इतिहास लोकगीतों में सुनाई देता है। पंजाब की स्थानीय नृत्य शैली गिद्दा, महिलाओं की विनोदपूर्ण गीत-नृत्य शैली है। सिक्खों के धार्मिक संगीत के साथ-साथ उपशास्त्रीय मुग़ल शैली भी लोकप्रिय है, जैसे खयाल, ठुमरी, गजल और कव्वाली।

पंजाबी वेडिंग

पंजाबी शादी की परंपराओं और समारोह परंपरागत रूप से पंजाबी में आयोजित किया गया और पंजाबी संस्कृति का एक मजबूत प्रतिबिंब होते हैं। मुसलमान, हिंदू, सिख, और जैनियों के बीच वास्तविक धार्मिक विवाह समारोह काजी, पंडित, ग्रंथी या पुजारी द्वारा अरबी, पंजाबी, संस्कृत, में आयोजित किया जा सकता है, अनुष्ठान, गीत, नृत्य, भोजन, पोशाक में समानताएं हैं। पंजाबी शादी पारंपरिक काल से विकसित है जिसमें कई रस्में और समारोहों होते है। पंजाबी शादी में शादी से एक रात पहले या सादी वाले दिन लड़की का मामा लड़की को चुड़ा पहनाता है। पंजाबी शादी की एक बड़ी ही मजेदार रस्म होती है जिसमें शादी से एक दिन पहले लड़की-लड़के की मीमियां जागो निकालती है। पित्तल की एक गगर को सजाया जाता है। जिसमें थोड़ी सी मीठ्ठी सी नोक-झोक भी शामिल है।

पंजाबी साहित्य

पंजाबी काव्य इसके गहरे अर्थ के शब्दों का सुंदर, रोमांचक और उम्मीद उपयोग के लिए प्रसिद्ध है। पंजाबी मानसिकता में स्पष्ट विचारों में से एक है। कई काम करता है कई भाषाओं में दुनिया भर में अनुवाद किया जा रहा है। सबसे महत्वपूर्ण पंजाबी साहित्य के प्रसिद्ध पंजाबी गुरु ग्रंथ साहिब है।

पंजाबी पोशाक


पंजाबी और कुर्ता, पंजाबी सलवार सूट, पंजाबी घाघरा और पटियाला सलवार है। पंजाबी पुरुषों के लिए पारंपरिक पोशाक कुर्ता और पायजामा, भारत में विशेष रूप से लोकप्रिय शैली के द्वारा प्रतिस्थापित किया जा रहा है, जो पंजाबी कुर्ता है। महिलाओं के लिए पारंपरिक पोशाक में पारंपरिक पंजाबी घाघरा की जगह जो पंजाबी सलवार सूट है। पटियाला सलवार भी बहुत लोकप्रिय है।






पंजाब की लोकप्रिय-कहानी हीर-रांझा

हीर पंजाब के झंग शहर में जाटों की सियाल उपजाति के एक अमीर परिवार में पैदा हुई एक बहुत सुन्दर स्त्री थी। धीदो रांझा चनाब नदी के किनारे तख़्त हज़ारा नामक गाँव के एक रांझा उपजाति वाले जाट परिवार के चार लड़कों में सबसे छोटा भाई था। वह अपने पिता का प्रिय बेटा था इसलिए जहाँ उसके भाई खेतों में महनत करते थे, रांझा बांसुरी (पंजाबी में ‘वंजली’) बजाता आराम की ज़िन्दगी बसर कर रहा था। उसकी भाभियों ने उसे खाना देने से इनकार कर दिया और वह घर छोड़कर निकल पड़ा और चलते-चलते हीर के गाँव पहुँच गया। वहाँ उसे हीर से प्यार हो गया। हीर ने उसे अपने पिता की गाय-भैसें चराने का काम दिया। रांझे की बांसुरी सुनकर वह मुग्ध हो गई और उस से प्यार कर बैठी। वह एक-दूसरे से छुप-छुप कर मिलने लगे। एक दिन उन्हें हीर का ईर्ष्यालु चाचा, कैदो, देख लेता है और उसके पिता (चूचक) और माता (मलकी) ज़बरदस्ती हीर की शादी एक सैदा खेड़ा नाम के आदमी से कर देते हैं।









रांझे का दिल टूट जाता है और वह जोग लेने के लिए बाबा गोरखनाथ के प्रसिद्ध डेरे, टिल्ला जोगियाँ, चला जाता है। गोरखनाथ के चेले अपने कान छिदाकर बालियाँ पहनने के कारण कानफटे कहलाते हैं। रांझा भी कान छिदाकर ‘अलख निरंजन’ का जाप करता पूरे पंजाब में घूमता है। आख़िरकर एक दिन वह हीर के ससुराल वाले गाँव पहुँच जाता है। हीर-राँझा दोनों हीर के गाँव आ जाते हैं जहाँ हीर के माँ-पिता उन्हें शादी करने की इजाज़त दे देते हैं लेकिन हीर का चाचा कैदो उन्हें ख़ुश देखकर जलता है। शादी के दिन कैदो हीर के खाने में ज़हर डाल देता है। यह ख़बर सुनकर रांझा उसे बचने दौड़ा आता है लेकिन बहुत देर हो चुकी होती है। रांझा बर्दाश्त से ज़्यादा दुख पाकर उसी ज़हरीले लड्डू को खा लेता है और हीर के बग़ल में दम तोड़ देता है। उन्हें हीर के शहर, झंग, में दफ़नाया जाता है और हर तरफ़ से लोग उनके मज़ार पर आकर उन्हें याद करते हैं।

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