• Kanika Chauhan

राजा बेटा…!!

ऑफिस से लौटकर घर में कदम रखते ही बंटी दौड़कर सुकेश से लिपट गया, “पापा आ गए, पापा मुझे आपको कुछ दिखाना है।” बेटे का उतावलापन देख सुकेश ने थके होने पर भी उसे गोद में उठा लिया।

आगे बढ़ते ही पिताजी के कमरे से जोर-जोर से खांसने की आवाज़ आई।

उसने पत्नी को देखा, “सीमा! बाबूजी डॉक्टर के पास गए थे?”

“नहीं! कैसे जाते! पूरी दोपहर तेज बारिश हो रही थी।” सीमा ने सफाई देनी चाही।

“कैसी बातें कर रही हो? रामू और बिरजू कहाँ है? इन नौकरों को छुट्टी लेने की आदत पड़ गई है।” सुकेश बिफर पड़ा। “घर में दूसरी गाड़ी थी ना! ड्राइवर को बोल दिया था बाबूजी को डॉक्टर के पास ले जाये, वो भी नहीं आया क्या?

ऑफिस में इतना बिज़ी होने पर भी समय निकाल कर मैंने डॉक्टर से अपॉइंटमेंट लिया था, वो भी बेकार हो जायेगा।” इस माहौल का अभ्यस्त बंटी अब भी पापा के पीछे लगा था। “पापा पहले आप मेरा होमवर्क देखिये। टीचर ने ‛राजा बेटा’ टॉपिक पर लिखने को कहा है। मैंने खुद लिखा है। आप चेक कीजिये और हां.. जहां गलत हो करेक्शन भी कर दीजिए।”

बंटी ने कॉपी पापा को थमा दी और खुद सुकेश के गले में बाहें डाल उसकी पीठ पर झूल गया। कॉपी खोलते ही पंक्तियाँ दिखी…

मैं अपने पिताजी का राजा बेटा हूं।

मैं अपने पिताजी को बहुत प्यार करता हूं और वो भी मुझे बहुत प्यार करते हैं।

पिताजी मुझे कंधे पर बैठाकर घुमाते और झूले पर झुलाते हैं।

सुकेश को अपना बचपन याद आने लगा। इसी घर में इसी तरह जब पिताजी उसे कंधे पर बैठाकर पूरे घर में घुमाते, बगीचे में झूले पर झुलाते, उसकी हर ज़रूरत को पूरा करते थे… उसका मन भीग गया। उसने आगे पढ़ना शुरू किया…

मेरे पिताजी मेरा बहुत ध्यान रखते हैं, मैं भी उनका ध्यान रखूंगा।

जब मैं बड़ा हो जाऊंगा उनके लिए ढेर सारे पैसे कमाऊंगा। अब तक उन पंक्तियों में सुकेश के बचपन और जवानी के साथ-साथ उसके पिता की जवानी और बुढ़ापा भी सांस लेने लगी थी। लेकिन अगली पंक्तियों में सुकेश ने अभी-अभी ज़िंदा हुई सांसों को घुटते हुए महसूस किया। आगे लिखा था…

इसके बाद जब पिताजी बूढ़े और बीमार हो जाएंगे तब वे अकेले हो जाएंगे क्योंकि मैं उनके साथ समय नहीं बिता पाऊंगा पर उनके लिए ढेर सारे नौकर रखूंगा और बड़े-बड़े डॉक्टरों के पास इलाज के लिए भेजूंगा।

पिताजी खुश हो जाएंगे और मैं राजा बेटा कहलाऊंगा।

सुकेश गंभीर हो गया। बंटी को गोद से उतारते हुए प्यार से कहा, “बेटा ये अभी भी अधूरी है। ‛राजा बेटा’ ऐसे नहीं होते। मैं तुम्हें बाद में करेक्शन करवाऊंगा। अभी ज़रूरी काम से जाना है।

सीमा.. चाय मत बनाना। अभी अपॉइंटमेंट का समय बचा है, मैं बाबूजी को डॉक्टर के पास ले जा रहा हूं। आकर पियूँगा।”

“चलिये बाबूजी! अभी देर नहीं हुई है। आप अकेले नहीं है, आपका ख़याल रखने के लिए मैं हूं ना!”

सुकेश ने सजल नेत्रों से बाबूजी की ओर देखा… वो मुस्कुरा रहे थे। कितना आसान होता है एक बेटे का ‛राजा बेटा’ बनना। बस एक छोटे से ‛करेक्शन’ की ज़रूरत होती है… सच में !!

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