• Kanika Chauhan

ये औरतें भी न !

दो मिनट की आरामदायक और बच्चों के पसंद की ज़ायकेदार मैगी को छोड़, किचन में गर्मी में तप कर, हरी सब्ज़ियाँ बनाती फिरती हैं। बच्चे मुँह बिचकाकर, नाराज़गी दिखलाते हैं सो अलग, फिर भी बाज नहीं आतीं ये औरतें भी न,

जब किसी बात पे दिल दुखे , तो घर में अकेले में आँसुओं की झड़ी लगा देंगीं । लेकिन बाहर अपनी सहेलियों के सामने तो ऐसे मुस्कुरायेंगीं, जैसे उनके जितना सुखी कोई नहीं। ये औरतें भी न,

जब कभी लड़ लेंगी पति से, तो सोच लेंगी अब मुझे, तुमसे कोई मतलब नहीं। लेकिन शाम में जब घर आने में पति महाशय को देर हो जाये, तो घड़ी पे टक-टकी लगाए रहेगी। और बच्चों से बोलेंगी, “फोन कर के पापा से पूछो आये क्यों नहीं अभी तक?” अरे यार! ये औरतें भी न,

तिनका तिनका जोड़कर अपने आशियाने को बनाती और सजाती हैं, चलती और ढलती रहतीं है सबके अनुसार। लेकिन कभी एक कदम भी बढ़ा ले अपने अनुसार, तो “यहाँ ऐसे नहीं चलेगा जाओ अपने घर(मायका) ये सब वहीं करना।” सुनके रो रोकर, सोचती रहतीं हैं, अब मैं इस घर में नहीं रहूँगी। रात भर आँसुओं से तकिया गीला कर, उल्लू की तरह आँखें सुजा लेती हैं। अगले दिन फिर से सुबह उठकर तैयार करने लगतीं हैं, बच्चों के टिफिन और सबके लिए नाश्ता। बदलने लगतीं हैं ड्राइंग रूम के कुशन कवर, और फिर से सींचने लगतीं हैं अपने लगाए पौधों को। सच में एकदम पागल हैं सोचतीं कुछ हैं और करतीं कुछ! ये औरतें भी न !!!

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