• Kanika Chauhan

मेरी कहानी मेरी जुबानी

एक लड़की थी, पगली सी दीवानी सी, थी वो नादान, इक परी सी लगती थी।

चुलबुली इतनी कि…. किसी की नहीं सुनती थी। अपने भोलेपन से सबका मन हरसाती थी।

हर बात पर वो यूँ हसा करती थी, वो तो यूँ ही मुस्कुराया करती थी। रूठो को मनाती थी, रोतो को हसाती थी।

जो काम कर सके न हर कोई, वो तो वो काम भी करके दिखाती थी। स्कूल में थी जब वो, बिन्दास सी रहा करती थी।

कहने को परायी थी पर, असलियत में परी थी वो। इक दिन माँ बाप उसके, थे बडे बैचेन।

जब भी देखती परी उन्हें, दिल भर आ ता परी का। पर चाहकर भी वो कुछ कर न पाती।

मूर्त थे माँ-बाप उसके भगवान की, ऐसा परी बस मानती थी। पापा की परी थी वो, भाई की सलाहकार, और बहन की दोस्त थी वो।

जब कभी बिगड जाता काम परी से, माँ उसकी झल्ला उठती और कहती.. जाना है तुझे ससुराल।

सुनकर नाम ससुराल का, परी का हो जाता बुरा हाल। ना वो समझ पाती,

ना वो जान पाती, कि.. क्या होता है ये ससुराल। सोचती परी अगर जाना पड़ा, सच में ससुराल ।

तो कौन रखेगा माँ -बाप का ख्याल। तभी पापा आते परी के, और बढाते उसका हौसला।

बचपन गुजरा जवानी आयी, और साथ अपने कुछ गम और खुशियाँ लायी। इक दिन वो पल भी आया , जब इक हसीन चेहरा ,

उसकी जिन्दगी में आया। देखकर उस अजनबी को, ऐसा लगा….

जैसे रब ने परी के लिए ही उसे बनाया। कहो दोस्त क्या देगा साथ? वो अजनबी उसका, जिन्दगी के इस सफर में।

क्या रखेगा वो ख्याल इस परी का? क्या पापा की ये परी बन पायेगी, इस हसीन अजनबी की पहचान।

क्या पिता की आखों का पानी, बन पायेगी ससुराल की नीर?

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