• Kanika Chauhan

“मैं मजदूर हूँ”

किस्मत से मजबूर हूँ। सपनों के आसमान में जीता हूँ, उम्मीदों के आँगन को सींचता हूँ। दो वक्त की रोटी खानें के लिये, अपने स्वभिमान को नहीँ बेचता हूँ। तन को ढकने के लिये फटा पुराना लिबास है। कंधों पर जिम्मेदारीहै जिसका मुझे अहसास है। खुला आकाश है छत मेरा बिछौना मेरा धरती है। घास-फूस के झोपड़ी में सिमटी अपनी हस्ती है। गुजर रहा जीवन अभावों में, जो दिख रहा प्रत्यक्ष है। आत्मसंतोष ही मेरे जीवन का लक्ष्य है। गरीबी और लाचारी से जूझ जूझकर हँसना भूल चुका हूँ। अनगिनत तनावों से लदा हुआ, आँसू पीकर मजबूत बना हूँ।

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