• Kanika Chauhan

तुम एक बार कह दो, तो रूक जाउं

वो सांवली छोटी सी लड़की.. न जाने क्यों मुझे चुपचाप देख रही थी। जैसे ही मैंने पलट कर देखा तो उसने नजर घुमा ली। अभी कुछ ही दिन हुए थे उसके पिताजी गांव से हमारे गांव में आए थे। माँ नही थी उसकी, टीबी की बीमारी से चल बसी थी। यही कोई तेरह चौदह बरस की होगी जब वो।

जब से वो हमारे घर के ऊपर वाले कमरे में किराए पर रहने आए है, मां तो उस पर लट्टू सी हो गई है, उसका नाम मीरा है। जब देखो माँ के पीछे घूमती रहती है, उनके काम मे हाथ बंटा देती है।

“देखा जाएं तो, उससे सिर्फ 2 वर्ष ही बड़ा हूं, पर इत्ती सी उम्र में कितनी समझदार है वो। घर का सारा काम कर लेती है। तेरे पीछे घूमते मेरा सिर दर्द होता है, बिचारी आ कर तेल भी लगा जाती है, तू… नालायक कही का परवाह है तुझे मेरी।”

माँ फिर शुरू हो गयी, मुझे बड़ी कोफ्त सी हुई। ये बिलान्त भर की लड़की जब से आई है माँ ने डांट कर मेरा जीना मुहाल कर दिया।

आज गेंद को बाड़े से उठा कर लाते हुए मैं गिर पड़ा। पूरा घुटना छील गया था। जैसे-तैसे घर पहुंचा।

“माँ, कहाँ हो तुम?” मैंने दर्द में आवाज़ दी।

“माँ जी तो बाजार गयी है।” उसने कहा। तभी उसकी नजर मेरे घाव पर गयी।

“है गौरी माता, ये क्या हुआ। मैं अभी आती हूँ।” वो कहकर ऊपर भागी और 5 मिनट बाद कटोरी में न जाने कौन सा लेप ले कर आयी।

वो लगाने को हुई कि मैं बोला, “तुम रहने दो, माँ आती होगीं” न चाहते हुए आह निकल गयी।

“देखो, तुम नखरे मत दिखाओ, उन्हें आने में समय लगेगा। मैंने चुपचाप एक अच्छे बच्चे की तरह अपना हठ छोड़ दिया। एक बार तो बड़ी जलन हुई। फिर थोड़ा आराम मिला।

वो रसोई में जा कर दूध में हल्दी डालकर ले आयी। न जाने क्यों मैंने ध्यान दिया कि वो मेरे बैग को देख रही थीं।

“तू नहीं जाती है क्या स्कूल?” मैंने उससे पूछा।

“छठी में थी जब माँ गुजर गई, फिर कैसे जाती?” उसका चेहरा रुआंसा हो गया।

“पता है, मास्टरनी जी कहती थी मीरा तू अच्छा पढ़ ले तो डॉक्टरनी बन जाएगी।” उसने चेहरे पर एक लम्बी सी मुस्कुराहट बिखेरते हुए कहा।

“इसीलिए तू मेरा इलाज कर रही थी।” मेरे ये कहते ही हम दोनों के चेहरे पर हंसी छूट गयी। इतनी बुरी भी न थी वो।

बस उसके बाद जब भी हम एक दूसरे को देखते, एक मुस्कान बिखर जाती अब मैं भी उसे थोड़ी बहुत बातें कर लेता था।

“अंग्रेजी सिखाओगे मुझे।” उसने एक दिन कहा।

“क्यों, फिरंगी मैम बनेगी तू।” मैंने उसका मज़ाक उड़ाते हुए कहा। उसका चेहरा उतर गया।

“अच्छा, चल पढ़ाऊंगा।” उसका चेहरा खिल गया।

शाम को जब भी मुझे समय मिलता मैं उसे पढ़ा दिया करता। दिन यूं ही गुजरते गए। वो कभी मेरा कमरा साफ कर देती, कभी मेरे सामान को जचा दिया करती। मैं अगर उसे कुछ कहता तो वो खीसे निपोरते हुए चली जाती।

“सुन मीरा, किवाड़ के पास मेरा वो फ़ोटो पड़ा था जो पिछली बार मैंने मेले में खिंचवाया था, तूने देखा क्या।” मैंने उससे पूछा और उसने इनकार में सिर हिला दिया।

समय अपनी गति से चलता गया। 2 बरस हो गए उन्हें इस घर में आये। मेरी दसवीं की परीक्षा थी इस बार फिर भी समय देकर उसको पढ़ा देता। पता नही क्यों मुझे लगता था कि वो मुझे अलग तरीके से देखा करती है जब भी मैं उसे देखता वो नजरें झुका देती।

एक दिन मैं रात को देरी से घर आया। थोड़ी ही देर पर दरवाजे पर आहट हुई, दरवाजा खोला तो मीरा सामने थी। उसकी बड़ी-बड़ी आंखे लाल सी हो रही थी।

“बापू की पक्की नौकरी शहर में लग गयी है।” उसने मुझे कहा।

“अरे वाह, बड़ी अच्छी बात है, अब तो तू शहर वाली हो जाएगी।” मैंने कहा।

“बस हम अभी निकलने ही वाले है, सारा सामान तैयार है।” वो बोल रही थी।

“हाँ, अच्छी बात है, शहर में पक्की नौकरी मिलना बड़ी बात है। मैंने उसे कहा।

वो एक मिनट चुप रही फिर आगे बढ़ गयी। पता नहीं क्या सुझा पलट कर मेरी तरफ आई और बोली “सुनो, तुम एक बार कह दो तो मैं रूक जाती हूँ।” “मैं क्यों रोकूंगा तुम्हे, तुम्हारे बापू ले जा रहे है। जाओ।” फिर वो पता नही मुँह में पल्लू ठूस भाग कर चली गयी। जाते-जाते उसके हाथ से कुछ गिर गया।

मैंने जा कर देखा तो मेरी वही मेले वाली फ़ोटो थी जो मिल नहीं रही थी। मैंने मन ही मन में कहा “चोर, कही की।

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