• Kanika Chauhan

चांद से बस ‘चार कदम’ की दूरी पर चंद्रयान, कैसा रहेगा आगे का सफर

7 सितंबर को रात 1.55 बजे चंद्रयान-2 चांद की सतह पर उतर जाएगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस ऐतिहासिक घटना का गवाह बनने श्रीहरिकोटा में रहेंगे। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के मुताबिक, चंद्रयान-2 पर लगे दो मोटरों को सक्रिय करने से यह स्पेसक्राफ्ट चंद्रमा की कक्षा में पहुंच पाया है।

7 सितंबर 2019। रात के ठीक 1 बजकर 55 मिनट। सब ठीक रहा तो यह भारतीय अंतिरक्ष इतिहास की सबसे बड़ी तारीख होगी। इस दिन अपना चंद्रयान-2 चांद पर होगा। बुधवार को श्रीहरिकोटा से लॉन्चिंग के 29 दिन बाद चंद्रयान ने सफर के सबसे मुश्किल पड़ावों में से एक को पार कर लिया। सुबह 9 बजकर 30 मिनट पर वह चंद्रमा की कक्षा में प्रवेश कर गया। चांद के 3 लाख 84 हजार किलोमीटर के सफर पर निकला चंद्रयान अब अपने मिशन से महज 18 हजार किलोमीटर दूर है। बता दें कि चंद्रयान सीधे चांद की ओर नहीं गया है, बल्कि पृथ्वी और अब चांद की कक्षाओं के कई चक्कर लाते हुए आगे बढ़ रहा है। चंद्रयान का आगे का सफर अब धड़कनें बढ़ाने वाला हो चुका है। जानिए कौन-कौन वे बड़े पड़ाव हैं, जो उसे पार करने हैं…

एक चूक से अंतरिक्ष में खो जाता चंद्रयान

चंद्रयान का अपनी कक्षा बदलना बेहद मुश्किल पड़ाव था। वैज्ञानिकों के मुताबिक चंद्रयान-2 को चंद्रमा पर स्थापित करने के लिए सैटलाइट को एक निश्चित गति से चंद्रमा की कक्षा में प्रवेश करना था। अगर उसकी रफ्तार तेज होती तो वह चंद्रमा की कक्षा से बाहर चला जाता और फिर गहरे अंतरिक्ष में खो जाता। अगर सैटलाइट की रफ्तार धीमी होती तो चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण बल चंद्रयान-2 को अपनी कक्षा में खींच सकता था, लेकिन चंद्रयान-2 ने बेहद सटीकता के साथ चंद्रमा की कक्षा में प्रवेश किया।



#WATCH Indian Space Research Organisation (ISRO) Chief K Sivan explains the intricacies of the #Chandrayaan2 mission using a miniature model. pic.twitter.com/Wqux0EflWZ — ANI (@ANI) August 20, 2019

अब बस 18 हजार किलोमीटर का सफर बाकी बुधवार को चंद्रयान-2 चांद की कक्षा में प्रवेश कर गया। मिशन से उसकी दूरी महज 18 हजार किलोमीटर रह गई है। अब उसे 20 अगस्त से 1 सितंबर के बीच चंद्रमा की चार और कक्षाओं को पार करना होगा।

इस तरह चार कक्षाओं को पार करेगा चंद्रयान

इसरो प्रमुख के सिवन ने बताया कि चंद्रयान-2 बुधवार को से चांद की चार कक्षाओं को पार करना शुरू करेगा। बुधवार दोपहर 1 बजे वह पहली कक्षा लांघेगा। इसके बाद 28 अगस्त, 30 अगस्त तथा फिर 1 सितंबर को चौथी कक्षा पार करेगा। तब चांद से उसकी दूरी 18 हजार किलोमीटर से घटकर बस 100 किलोमीटर रह जाएगी।

जब दुल्हन की तरह ऑर्टिबर से विदा लेगा विक्रम

इसके बाद 2 सितंबर को सबसे इस सफर का एक और हम पड़ाव आएगा। लैंडर विक्रम उसे धरती और चांद की कक्षा में सैर करा रहे अपने ऑर्बिटर से अलग हो जाएगा। इसरो चीफ ने बताया कि इसके बाद सारा ध्यान लैंडर पर केंद्रित हो जाएगा। सिवान ने इस चरण को बेहद दिलचस्प तरीके से समझाते हुए कहा कि यह कुछ ऐसा ही होगा जैसे कोई दुल्हन अपने माता-पिता के घर से विदा लेकर ससुराल के लिए निकल जाती है।

…और उतरने के लिए सही वक्त का इंतजार करेगा विक्रम

अपने सीन में रोवर प्रज्ञान को छिपाए लैंडर विक्रम चांद पर उतरने के लिए सही वक्त का इंतजार करेगा। लैंडर विक्रम का चांद की सतह पर उतरना इस पूरे मिशन की सबसे मुश्किल चरण है।

वो 15 मिनट जब थम जाएंगी धड़कनें

मिशन के सबसे तनावपूर्ण क्षण चांद पर विक्रम की लैंडिंग से पहले के 15 मिनट होंगे। यानी 7 सितंबर की रात 1 बजकर 55 मिनट से पहले तनाव अपने चरम पर होगा। खुद भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी इसरो के चीफ के सिवन ने कहा है कि लैंडिंग के अंतिम 15 मिनट बेहद चुनौतीपूर्ण रहेंगे क्योंकि उस दौरान हम ऐसा कुछ करेंगे जिसे हमने अभी तक कभी नहीं किया है। सिवन ने कहा, ‘चंद्रमा की सतह से 30 किलोमीटर दूर चंद्रयान-2 की लैंडिंग के लिए इसकी स्पीड कम की जाएगी। विक्रम को चांद की सतह पर उतारने का काम काफी मुश्किल होगा। इस दौरान का 15 मिनट काफी चुनौतीपूर्ण होने वाला है। हम पहली बार सॉफ्ट लैंडिंग की करेंगे। यह तनाव का क्षण केवल इसरो ही नहीं बल्कि सभी भारतीयों के लिए होगा।’ सॉफ्ट लैंडिंग में सफलता मिलते ही भारत ऐसा करने वाला दुनिया का चौथा देश बन जाएगा। अभी तक अमेरिका, रूस और चीन के पास ही यह विशेषज्ञता है।

रोवर प्रज्ञान का क्या होगा

चांद की सतह पर पहुंचने के बाद लैंडर (विक्रम) और रोवर (प्रज्ञान) 14 दिनों तक ऐक्टिव रहेंगे। 27 किलोग्राम का रोवर 6 पहिए वाला एक रोबॉट वाहन है। इसका नाम संस्कृत से लिया गया है, जिसका मतलब ‘ज्ञान’ होता है। रोवर प्रज्ञान चांद पर 500 मीटर (आधा किलोमीटर) तक घूम सकता है। यह सौर ऊर्जा की मदद से काम करता है। रोवर सिर्फ लैंडर के साथ संवाद कर सकता है। इसकी कुल लाइफ 1 ल्यूनर डे की है जिसका मतलब पृथ्वी के लगभग 14 दिन होता है।

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