• Kanika Chauhan

कोई कविता !!

मन करता है मेरा कि मैं तुम पर कोई कविता लिखूं!! जिसमें अपने भावों को कुछ कहने दूं, और फिर बहने दूं मन की सरिता…. फिर सोचती हूं अगर बहने दूं सरिता को, तो कहीं डूब न जाए ये धरती!!

फिर सोचती हूं उसे सीमा में बांध लू… पर ख्याल आता है फिर अगर बांध लू… तो कही विद्रोह न कर जाए मेरा मन!! वो तो चंचल है… कल-कल बहता है… वो न करे स्वीकार बंधन को!!

हर बात करती यूं यही कोशिश पूरी हो जाए मेरी कविता… पर भावों के इस मंथन में… सब कुछ अनंत हो जाता है!! बस रह जाता है कोई मन में… भावों के सागर सा बहता!!

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