• Kanika Chauhan

औरत ही बनी औरत की दुश्मन

देखा जाए तो समय बहुत बदल चुका है हर क्षेत्र में पहले से काफी बदलाव है। समय के साथ लोगों का रहन-सहन बदला… खाने-पीने के तौर-तरीके बदले… जिंदगी जीने का मतलब बदला… हर व्यक्ति ने समय के साथ अपने आप को बदला। एक वो समय भी था जब लोगों की सोच थी कि पुरूष बाहर का काम देखते और महिलाएं घर का…उस समय महिलाओं को काम करने की आजादी नहीं थी…अपने सपनों को पुरा करने के लिए उनके पास पंख नहीं थे। सपने तो न जाने कितनी लड़कियों ने आसमान में उड़ने के देखे होगें पर उन्हें पूरा करने का साहस नहीं था और अगर हम आज की सोच पर नजर डाले तो बहुत कुछ बदला है अब लोगों की सोच ये नहीं कि महिलाएं केवल घर ही सम्भाले आज हर चौथी… शायद ये कहना गतल होगा आज तो हर दूसरी महिला घर से बाहर निकल कर काम कर के अपने पैरों पर खड़ी है।  आज उसे अपने सपने पूरे करने के लिए किसी का डर नहीं है शायद आज उसके पास उसके सपनों को पूरा करने के लिए पंख मिल गए हैं। आज महिलाएं पुरूषों के साथ कंधे से कंधा मिला कर चल रही हैं। वो डरी सहमी सी…रातों को तारे गिनते गिनते आसमान में उड़ने वाली चांद तारों तक जा पहुंची है। समय ने पुरूषों के साथ – साथ महिलाओं की सोच को भी बदला यही कारण है आज महिला चांद-तारों तक जा पहंची है लेकिन जहां सवाल आता है किसी पीड़ित का साथ देने का तो अक्सर महिलाएं ही उनके विरोध में खड़ी नजर आती हैं। इसे मैं सामाजिक ताना-बाना कहूं या सदियों से चली आ रही रीत…. विडंबना पर गौर किया जाए तो ज्यादातर मामलों में आज भी महिलाओं की एक बड़ी विरोधी के रूप में महिला ही खड़ी नजर आती है। कही देखती हूं कि महिलाएं कई मोर्चों पर एक साथ लड़ाई लड़ रही हैं तो कही दूसरी की विरोधी है। समाज की कुछ ऐसी बातें जो आज भी खटकती हैं वो हैं हमारे दोहरे मापदंड। जहां अपनी बेटियों और घर की महिलाओं को सात तालों मे कैद रखना चाहते हैं तो वहीं औरों की बेटियों को निर्वस्त्र करना चाहते हैं। ये कैसी सभ्यता है, कैसी संस्कृति है और कैसा समाज हैं ??? जहां जिसकी लाठी उसकी भैंस की नीति चलती है। पुलिस से लेकर न्यायाधीश, नेता और समाज में बड़ी संस्थाओं के सर्वोच्च पदों पर जो लोग विराजमान हैं, जो सफेदपोश हैं और जो अपने घरों में महिलाओं की इज्जत-मर्यादा की बात करते हैं, जिनको समाज-निर्माण और व्यक्ति-निर्माण का काम करने के लिए शिक्षण संस्थानों में नियुक्त किया गया और जो धर्म के रखवाले हैं व दुनिया के समक्ष नैतिकता की प्रतिमूर्ति बनकर अपना वर्चस्व कायम करते हैं, वे क्या कुछ कर रहे हैं और कहां खड़े हैं? क्या वे अपने गिरेबान में झांक रहे हैं? साफ है कि जो समुदाय उत्पीडित है, जिसे हिंसा का शिकार बनाया जा रहा है। इस दशा के लिए जिम्मेदार कौन-सी ताकतें हैं और संगठित होकर दिमाग के बल पर लोहा लेना होगा केवल पुरुष बलात्कारी या संभावित बलात्कारी से नहीं बल्कि इन तमाम ताकतों से जो कमजोरों को दबाते हैं और उन पर अत्याचार कर शक्ति का अहसास करते हैं तो अपने आप सभ्यता के इस पार वालों की मजबूरी होगी कि वे भी लड़ने वालों का साथ देंगे और तब नई सभ्यता को गढ़ने का मौका होगा।

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