• Kanika Chauhan

एक नदी बहती रही‌

एक मीनार उठती रही। एक मीनार ढहाती रही। अनथकी अनरुकी सामने। यह नदी किंतु बहती रही। पर्वतों से उतरती हुई। घटिया पार करती हुई। तोड़ती पत्थरों के किले। बीहड़ों से गुजरती हुई। चांद से बात करती रही। सूरज का ताप सहती रही। यह नदी किंतु बहती रही। साहस के बादल छूकर। घाट घाट घूमती रही। मिली अपने दोस्तों से एक दिन। दुख उनका सुनती गई। यह नदी किंतु बहती रही। गंदगी समाकर अपने भीतर। स्वच्छता करती रही। देखकर जीवन जन कणो को। सुख कर मरती गई। यह नदी किंतु बहती रही।

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