• Kanika Chauhan

एक कदम गंगा नदी को साफ करने की ओर

कहते हैं जब कोई एक कदम किसी अच्छे काम की तरफ बढ़े तो लोग अपने आप आपके साथ जुड़ने लगते हैं। गंगा भारत की पवित्र नदियों में से एक है जो आज बेहद दूषित हो चुकी है या यूं कहूं कि हमारी गंगा नदी अब बिमार है।

गंगा नदी के दूषित होने का हाल ये हो गया कि लोग दिन पर दिन उसे गंदा करते रहे और वो गंदी होती रही। जैसे मानो कह रही हो अब तो मुझे और गंदा न करो। हम जिस नदी को पूजते है उसी नदी को दूषित भी हम कर रहे हैं। गंगा नदी दूषित होती जो रही थी तभी उत्तराखंड के तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ रमेश पोखरियाल निशंक ने गंगा की पुकार को सुना और 17 दिसंबर 2009 में स्पर्श गंगा का शुभारंभ ऋषिकेश में किया। जिसमें राष्ट्रीय सेवा योजना के छात्रों ,एनसीसी , स्थानीय लोगों, संस्थाओं ने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया।

स्पर्श गंगा के बारे में और अधिक जानने के लिए हमने स्पर्श गंगा के संयोजक शिखर पालीवाल के साथ कुछ बातें की तो आइए स्पर्श गंगा को थोड़ा और जाने….

शिखर पालीवाल ने बताया कि बढ़ती आबादी के दबाव से उपजे अवशिष्ट पदार्थों ने आज इन नदियों को दूषित कर दिया है। हम रोज़ पवित्र नदियों का आह्वान तो करते हैं लेकिन खुद नदियों को मैला करने पर तुले हैं। तन और मन की निर्मलता हमें नदियाँ ही प्रदान करती है अत: हमारा दायित्व बनता है कि हम नदी और घाटों को निर्मल बनाए रखे। इसीलिए स्पर्श गंगा को हर उस राज्य में अभियान की तरह चलना चाहिए जहां-जहां से गंगा प्रवाहित होती हैं।

NSS, NCC, स्थानीय लोगों और संस्थाओं के साथ ही साथ गंगा सेवा एवं पर्यावरण संरक्षण समिति के लगभग 80000 सदस्यों और गढ़वाल विश्वविद्यालय के क़रीब दो हज़ार छात्रों ने अभियान की शुरूआत की। मुझे यह बतातते हुए बहुत गर्व महसूस हो रहा है कि आज क़रीब 5000 युवा, महिलाएँ एवं बच्चे लगातार हर रविवार को इस अभियान में अपना योगदान दे रहे हैं। हमारे लिए सबसे ज्यादा गर्व की बात तो यह कि इस अभियान की ताकत महिलाएँ और युवतियां हैं। उत्तराखंड के ज़िले हरिद्वार में कार्यरत तीस टीमों में से बारह टीमों का प्रतिनिधित्व भी महिलाएँ ही करती हैं।

जहाँ तक मेरा मानना है कि हजारों-लाखों लोग गंगा को साफ़ करने में समर्थ तो हैं पर सफल तब तक नहीं हो पाएंगे जब तक जन-जन के अंदर ये जागरूकता ना पैदा की जाए कि गंगा जो हमारी आस्था की पहचान है और जीवनदायिनी भी है जो दो तिहाई जनसंख्या का सीधा भरण-पोषण भी करती है। अगर यह बात जन भागीदारी के माध्यम से सबको समझायी जाए कि गंगा के बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती है तो मैं समझता हूँ कि यह अभियान सार्थकता की ओर है।

देखिए स्वच्छता में ही ईश्वर का वास होता है। तीर्थ स्थान लोगों में आस्था का संचार करते हैं, साफ़ सुथरा जल, स्वच्छ वातावरण लोगों को आकर्षित करता है उसी तरह यह स्पर्श गंगा अभियान से लोगों के मन में आस्था और तन में स्वच्छता को बढ़ावा देगा तो कहीं न कहीं श्रद्धालुओं की तादाद भी बढ़ेगी।

आज भारत वर्ष में दो तिहाई युवा ही निर्णायक भूमिका निभा रहा है जिस तरफ़ युवा चलेगा उस तरफ़ देश बढ़ेगा और युवाओं की सहभागिता इस अभियान में यह सुनिश्चित कर रही है आज का युवा प्रधानमंत्री की राष्ट्र निर्माण के यज्ञ में अपनी आहुति दे रहा है।

यह मेरी सोच है कि जितना ज़्यादा युवा स्वच्छता के अभियान में बल देगा ये उतना ही देश को बदलने में मदद करेगा।

इसमें कोई दो राय नहीं कि हमारे द्वारा किया जा रहा जनजागरण और हमारे द्वारा चलाए जा रहे स्वच्छता अभियान का स्तर और उसका प्रभाव तब ज़्यादा बढ़ेगा जब हम सरकारी तंत्रों और उपकरणों के साथ इस अभियान में आगे बढ़ेंगे।

गंगा को भविष्य में भी साफ-सुथरा बनाए रखने के लिए मैं तो कहूंगा कि भविष्य में इस तरह की अभियानों की कभी ज़रूरत ही न पड़े। यह तभी फलदायी होगा जब गंगा और उसके आस-पास की जगहों को साफ़ करने की बजाय लोगों के मन में गंगा को साफ रखने का नजरीया हो। राष्ट्र निर्माण का बीड़ा उठाया जाए तो यह इस तरह के अभियानों के माध्यम से ही सफल होंगे।

नदी किनारे घाट नहीं बाघ बग़ीचे बनाए जाए, पौध-रोपण किया जाए, नदी किनारे आबादी घटायी जाए, पोलिथीन प्रतिबंधित हो, धर्मगुरु ऐसी प्रथाओं का विकल्प दें जिससे लोग नदियों में धार्मिक वस्तुओं किताबों कपड़ों को डालना बंद करे, स्कूल-कॉलेजों, सरकारी कार्यालयों में नुक्कड़ नाटकों और सभाओं के माध्यम से लोगों को जागरूक किया जाए की नदियाँ ही हमारी जीवनरेखा हैं।

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