• Kanika Chauhan

एक अनोखा मुकद्दमा

न्यायालय में न जाने कितने ही मुकदमें रोजाना आते हैं। जो अक्सर प्रॉपर्टी विवाद या पारिवारिक विवाद के होते हैं। लेकिन यह मुकदमा ऐसा था जिसने सबको झकझोर कर रख दिया। जिसको हड़ते सुनते ही आंखे नम हो गई पर आप भी चाहेगें ऐसा मुकद्दमा आपके घर में भी हो।

मुकद्दमा था दो बूढ़े भाईयों का। 70 साल के रमेश ने अपने 80 साल के भाई निलेश पर किया था। मुकद्दमा कुछ यूं था कि रमेश का कहना था कि मेरा भाई निलेश अब 80 साल का बूढ़ा हो चला है इसलिए वह खुद अपना ख्याल भी ठीक से नहीं रख सकता, तो मेरी 110 साल की मां का ख्याल कैसे रखेगा। मेरे लाख मना करने पर भी वह हमारी मां की देखभाल करता है।

मैं अभी ठीक हूं, इसलिए अब मुझे मां की सेवा करने का मौका दिया जाना चाहिए और मां को मुझे सौंप दिया जाए।

न्यायाधीश महोदय का दिमाग घूम गया और मुक़द्दमा भी चर्चा में आ गया। न्यायाधीश महोदय ने दोनों भाइयों को समझाने की कोशिश की कि आप लोग 15-15 दिन रख लो। मगर कोई टस से मस नहीं हुआ, बड़े भाई निलेश का कहना था कि मैं अपने स्वर्ग को खुद से दूर क्यों होने दूं। अगर मां कह दे कि उसको मेरे पास कोई परेशानी है या मैं उसकी देखभाल ठीक से नहीं करता, तो अवश्य छोटे भाई रमेश को दे दो। छोटा भाई रमेश कहता कि पिछले 40 साल से अकेले ये सेवा किए जा रहे हैं, आखिर मैं अपना कर्तव्य कब पूरा करूंगा।

परेशान न्यायाधीश महोदय ने सभी प्रयास कर लिये ,मगर कोई हल नहीं निकला। आखिर उन्होंने मां की राय जानने के लिए उसको बुलवाया और पूंछा कि वह किसके साथ रहना चाहती है। बेहद कमजोर केवल 30 किलो की औरत बड़ी मुश्किल से व्हील चेयर पर आई थी। उसने दुखी दिल से कहा कि मेरे लिए दोनों संतान बराबर हैं। मैं किसी एक के पक्ष में फैसला सुनाकर ,दूसरे का दिल नहीं दुखा सकती। आप न्यायाधीश हैं , निर्णय करना आपका काम है। जो आपका निर्णय होगा मैं उसको ही मान लूंगी।

आखिर न्यायाधीश महोदय ने भारी मन से निर्णय दिया कि न्यायालय छोटे भाई की भावनाओं से सहमत है कि बड़ा भाई वाकई बूढ़ा और कमजोर है। ऐसे में मां की सेवा की जिम्मेदारी छोटे भाई रमेश को दी जाती है।

अभी फैसला सुना ही था कि निलेश जोर-जोर से रोने लगा कि इस बुढ़ापे ने मेरे स्वर्ग को मुझसे छीन लिया। अदालत में मौजूद न्यायाधीश समेत सभी रोने लगे।

कहने का तात्पर्य यह है कि अगर भाई बहनों में वाद विवाद हो ,तो इस स्तर का हो। ये क्या बात है कि ‘माँ तेरी है’ की लड़ाई हो,और पता चले कि माता-पिता ओल्ड एज होम में रह रहे हैं, यह पाप है। हमें इस मुकदमे से ये सबक लेना ही चाहिए कि माता-पिता का दिल दुखाना नहीं चाहिए।

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