• Kanika Chauhan

“आत्म-परिचय”

मैं वह खंडहर का भाग लिए फिरती हूं !! मैं रोई इसको तुम कहते हो गाना, मैं फूट पड़ी तुम कहते छद बनाना… क्यों कवि कहकर संसार मुझे अपनाए, मैं दुनिया की हूं एक नई दिवानी… मैं दिवाना सा वेश लिए फिरती हूं, मैं मादकता निःशेष लिए फिरती हूं… जिसको सुनकर जग झूम-झके लहराएं, मैं मस्ती का संदेश लिए फिरती हूं!!

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